‘गरीबी रेखा’ के लिए औसतन कम से कम चौबीस सौ कैलोरी प्रतिदिन प्रति व्यक्ति का जो मानक भारतीय योजना आयोग द्वारा कभी निर्धारित किया गया था, क्या इतनी कैलोरी के उपभोग की आत्मनिर्भरता बंगाल की दीनता के अंधेरे खोखल में बैठे समाज में मौजूद है? गांवों के स्थानीय संसाधनों के समुचित उपभोग, जहरीली खेती से मुक्ति से लेकर बंगाल की परंपरागत खाद्य-संस्कृति की पुनर्स्थापना के अलावा गैर-परंपरागत खेती और उपज के मूल्य संवर्धन समय की जरूरत हैं, क्या बंगाल में ऐसी पहल की गई है?
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