दुर्भाग्य से पिछले कुछ दशकों में प्रकृति के प्रति हमारा व्यवहार बहुत लालची हो गया है। हमने बरसात के जल को संग्रहित करने वाले परंपरागत संसाधनों को तो विकास के नाम पर नष्ट कर दिया, लेकिन जल संबंधी हमारी जरूरतें लगातार बढ़ती जा रही हैं।
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