गांधी जी ने भारत की सामाजिकता, उसकी सांस्कृतिक परिपक्वता को समझा था, धर्म यानि सदाचरण के महत्त्व को समझा था और उसे व्यावहारिक स्वरूप देने में जीवन लगाय था। उनका स्पष्ट विचार था कि 'ऐसी कोई भी संस्कृति जो सबसे बच कर रहना चाहती है, जीवित नहीं रह सकती है।'
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