जैसे-जैसे भौतिकतावादी संस्कृति बढ़ रही है वैसे-वैसे दिखावे की संस्कृति में भी वृद्धि हो रही है, जिसके चलते हर जगह प्रतिस्पर्धा भी बढ़ रही है और जो इस प्रतिस्पर्धा में खुद को विफल या कमतर अनुभव करता है, वह अवसाद का शिकार हो जाता है। साथ ही लोगों में संघर्ष करने का जज्बा और आपसी सामंजस्य की भावना घटी है, असहनशीलता और व्यक्तिवादिता बढ़ी है। नतीजतन, व्यक्ति समाज से कटा हुआ अनुभव करता, अकेलेपन का शिकार हो जाता है।
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