हालांकि आज भी इसरो में सेटेलाइट बनाने में साठ फीसद से अधिक का योगदान निजी क्षेत्र की कंपनियां ही करती हैं। मगर इस पूरी प्रक्रिया का एक नकारात्मक पहलू यह रहा है कि निजी क्षेत्र की दिलचस्पी लंबे वक्त के निवेश में नहीं होती। अब जो नई नीति बनी है, उससे अंतरिक्ष परियोजनाओं में निश्चित तौर पर बड़े निवेश को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
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