लैंगिक भेदभाव किसी भी व्यक्ति के मन में यकायक उत्पन्न नहीं होता। यह समाजीकरण की उस निरंतर चलने वाली प्रक्रिया से ही जन्म लेता है, जो बाल्यकाल से ही आरंभ हो जाती है। महिलाओं के भीतर इस मिथ्या सोच को अंकित करने का निरंतर प्रयास किया जाता है कि महिलाओं का मूल दायित्व परिवार की देखभाल और घरेलू कार्य करना ही है।
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