खेती घाटे का सौदा बन गई है। ज्यादातर किसान परिवार जीविका का कोई अन्य विकल्प मौजूद न होने की मजबूरी में ही खेती में लगे हैं। जिन्हें जरा भी कोई कोई काम शहरों में मिल जा रहा है, वे खेती का काम छोड़ कर दूसरे कामों में लग जाते हैं। खेतिहर मजदूरों के लिए तो दो जून की रोटी भी मुश्किल से मिल पाती है।
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