समय की मांग यह थी कि ऐसी प्रणाली लागू की जाए जो खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तैयार की गई हमारी नीतियों का अनुपूरक हो। जब हम कृषि उपज बढ़ाने में सफल रहे, तब भी हम विश्व में पिछड़ गए। किसानों के लिए मूल्य प्राप्ति उपभोक्ताओं द्वारा भुगतान किए गए खुदरा मूल्य का अंश मात्र था। इसी प्रकार गुणवत्ता नियंत्रण और प्रमाणन की कमी थी, जिसके परिणामस्वरूप खाद्य निर्यात बाजारों में भारत का एक छोटा-सा हिस्सा था।
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