अपनी भाषाओं में सिविल सेवा परीक्षा की शुरुआत होने से दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़ा वर्ग के हजारों उम्मीदवार देश की उच्चतर सेवाओं में शामिल हुए और उन्हें मुख्यधारा में आने का मौका मिला। भारतीय भाषाओं के जरिए यह आरक्षण नीति की सफलता का सबसे बड़ा उदाहरण है। फिर अचानक 2011 में एक ही झटके में प्रारंभिक परीक्षा और मुख्य परीक्षा का स्वरूप बदल दिया गया।
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