गरीब, आदिवासी, निम्न जाति या हाशिए के लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली आबादी निरंतर शोषण का शिकार होती है और न्याय से वंचित रहती है। उसकी अज्ञानता और ईमानदारी ही कमजोरियां बन जाती हैं और प्रभावी समूह उसका लाभ उठा कर शोषण एवं दमन की प्रक्रिया को इतना तीव्र कर देते हैं कि न्याय के अर्थ को यह समूह समझ ही नहीं पाता। पिछले कुछ वर्षों में समाज में ऐसी अनेक विसंगतियां उत्पन्न हुई हैं जिसने लोकतंत्र के सम्मुख ऐसी ही चुनौतियां उत्पन्न की हैं।
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