यह सवाल महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि सरकारी खजाने से विकास के नाम का निकला पैसा आखिरी छोर पर नहीं पहुंचने के पीछे की वजहें क्या हैं? विकास की अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के रहते तमाम तरह की गरीबी की मौजूदगी अपने आप में बड़ा सवाल है। ऐसे सवाल लोकतंत्र को लांछित करते हैं। अगर सही मायनों में देश में विकास की धारा बही होती तो जंगलों में रहने वाले अल्प-शिक्षित या ग्यारह फीसद से भी कहीं कम साक्षरता की तथाकथित उपलब्धियां देखने को नहीं मिलती।
from Jansattaराजनीति – Jansatta https://ift.tt/3o4T7wh
via
- Blogger Comment
- Facebook Comment
Subscribe to:
Post Comments
(
Atom
)
0 comments:
Post a Comment