तमाम जद्दोजहद के बाद भी देश की मात्र सत्ताईस फीसद महिला आबादी कामकाजी है। इसमें भी ग्रामीण क्षेत्र की ज्यादातर महिलाएं कृषि और असंगठित क्षेत्र के कार्यों में लगी हैं। अब प्रश्न है कि क्या शेष महिलाओं को पराश्रित और अक्षम मान लिया जाना चाहिए? यह भी कि जिन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए ‘अपने आप में सक्षम स्त्री’ आर्थिक रूप से सक्षम होने की दिशा में बढ़ी, क्या उसे उन राहों की बदौलत मुक्ति और विकास की राहें हासिल हो पार्इं?
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