अपनों को मार कर मर जाने या पीड़ादायी परिस्थितियों में घर के सभी सदस्यों के एक साथ आत्महत्या कर लेने की बढ़ती प्रवृत्ति कहीं न कहीं हमारी सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था की विफलता है। कौन किस मनोदशा से गुजर रहा है, यह जानने-समझने का समय किसी के पास नहीं।
from Jansattaराजनीति – Jansatta https://ift.tt/3csNDHR
via
- Blogger Comment
- Facebook Comment
Subscribe to:
Post Comments
(
Atom
)
0 comments:
Post a Comment