महिला हिंसा की कोई जाति नहीं होती, कोई नस्ल नहीं होता, कोई धर्म, मजहब भाषा या क्षेत्रीयता नहीं होती। महिलाओं को धन, धर्म और वर्ग में विभाजित करके हम उन्हें कोई न्याय नहीं दे पाते। दुखद यह है कि दलित, आदिवासी, घरेलू कामों को करने वाली या कामकाजी महिलाओं के भीतर जो सुरक्षा का भाव स्वाधीनता के सत्तर साल बीतने के बाद आ जाना चाहिए था, वह अब भी संभव नहीं हो पाया है।
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