आधुनिक समाज में व्यक्ति अपने निजी जीवन में संस्कृति, मूल्यों, परंपराओं इत्यादि से भयभीत रहने लगा है। पूंजीवाद के विस्तार ने उसमें भयभीत होने की आदत डाल दी है। इसलिए न तो वह अपने सार्वजनिक जीवन में संघर्षों का प्रभावी मुकाबला कर पा रहा है, न ही अपने निजी जीवन में स्वतंत्र निर्णय ले पा रहा है।
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