ऑनलाइन उपलब्ध सामग्री में एक और बड़ी कमी लैंगिक भिन्नता से सही तरीके से न निपटने की है। एक तो पाठ्यपुस्तकों में इस तरह की सामग्री की भारी कमी है, साथ ही उनकी व्याख्या में वही पितृसत्तावादी औजार इस्तेमाल किए जाते हैं। जगह-जगह उनके अपने पूर्वग्रह सामने आए हैं, जो इस मामले में कोई नई दृष्टि देने के बजाय पुरानी मान्यतों को ही पुनरुत्पादित करते हैं।
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