निजी और सहकारी बैंकों में आमतौर पर कारोबारी योजनाएं त्रुटिपूर्ण और जोखिमभरी होती हैं। बैंकिंग कामकाज में प्रवर्तकों का जरूरत से ज्यादा बढ़ता हस्तक्षेप कई गंभीर संकटों को जन्म देता है। कई बार प्रवर्तक ही बैंक के प्रबंध निदेशक बन जाते हैं और अपनी मर्जी से बिना निदेशक मंडल की सहमति के बड़े कर्ज अपने परिचितों को दे देते हैं, जिनकी वसूली संदिग्ध होती है।
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