मुद्दा केंद्रीय बैंक के निगरानी तंत्र की लापरवाही से जुड़ा है। इसी वजह से बैंकों में होने वाली बड़ी गड़बड़ियों को समय रहते रोका नहीं जा सका। वरना नीरव मोदी और ऐसे अन्य कर्जदार कैसे हिम्मत कर पाते कि बैंकिंग व्यवस्था को ठेंगा दिखाते हुए हजारों करोड़ का गोलमाल करते रहें और बैंक खोखले होते चले जाएं।
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